कर्मयोगी

कर्मयोगी

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देखो, हाथों में झाडू लिए
कोई काम कर रहा है
खुद बदबूदार-गंदी सांसें लेकर
हम सब को साफ सुथरी सांसें मिलें
इसका इंतज़ाम कर रहा है
देखो हाथों में झाडू लिए
कर्मयोगी काम कर रहा है

जिस गन्दगी को देख
सब लोग मुँह मोड़ लेते है
गंदी बदबू से बचने के लिए
अपनी उंगलियों से नाक को सिंकोड़ लेते हैं
उसी गन्दगी को खत्म करने का काम
यह सुबह- शाम कर रहा है
खुद बदबूदार -गंदी सांसें लेकर
हम सब को साफ सुथरी सांसें मिलें
इसका इंतज़ाम कर रहा है
देखो हाथों में झाडू लिए
कर्मयोगी काम कर रहा है

इसकी तारीफ़ करना किसी को स्वीकार नहीं है
इसकी सेहत पर भी किसी का कोई विचार नहीं है
प्रतिदिन है इसे काम करना
इसके लिए कोई रविवार नहीं है
फिर भी बिना प्रशंसा के अपना काम कर रहा है
खुद बदबूदार -गंदी सांसें लेकर
हम सब को साफ सुथरी सासें मिलें
इसका इंतज़ाम कर रहा है
देखो हाथों में झाडू लिए
कर्मयोगी काम कर रहा है

पता नहीं, कितने टन कचरा उठा चुका है
पता नहीं,कितने विश्व रिकॉर्ड बना चुका है
फिर भी ,कहां यह देश की पहचान बन रहा है
टेक माथा इस पावन धरा को
यह अपना काम कर रहा है
खुद बदबूदार -गंदी सांसें लेकर
हम सब को साफ सुथरी सांसें मिलें
इसका इंतज़ाम कर रहा है
देखो हाथों में झाडू लिए
कर्मयोगी काम कर रहा है

गंदी नलियो में उतरना इतना आसान नहीं है
इसके त्याग का किसी को अनुमान नहीं है
सब को मिले स्वस्थ वातावरण
इससे बड़ा कोई कल्याण नहीं है
देखो, कोई यह कल्याण बार -बार कर रहा है
खुद बदबूदार -गंदी सांसें लेकर
हम सब को साफ सुथरी सांसें मिलें
इसका इंतज़ाम कर रहा है
देखो हाथों में झाडू लिए
कर्मयोगी काम कर रहा है

( संजय कुमार फरवाहा )

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शिक्षा पाने के लिए कब लड़ोगे

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शिक्षा पाने के लिए कब लड़ोगे

कभी भूमि के लिए लड़ते हो,
कभी पानी के लिए लड़ते हो,
राष्ट्र को धर्म,मज़हब,जाति में बाँट कर,
कभी भाषा के लिए लड़ते हो,
पूरा राष्ट्र शिक्षित हो,
इस बात पर कब अड़ोगे,
शिक्षा पाने के अधिकार के लिए,
कब लड़ोगे ।

प्रवक्ता बनके टी.वी.पर रोज़ आते हो,
धर्म,मज़हब,जाति पर चर्चा रोज़ चलाते हो,
हिन्दू -मुस्लिम को आपस में बाँट कर,
धर्म के ठेकेदार होने का ढोल रोज़ बजाते हो,
पूरा राष्ट्र शिक्षित हो,
इसके लिए चर्चा कब करोगे,
शिक्षा पाने के अधिकार के लिए,
कब लड़ोगे ।

खुद को देश का नेता कहते हो,
मुद्दों को लेकर धरने देते रहते हो,
सब को शिक्षित करने का विचार लेकर,
जन्तर-मन्तर की ओर कब बढ़ोगे,
धरना देकर शिक्षा के मुद्दे पर,
कब अड़ोगे,
शिक्षा पाने के अधिकार के लिए,
कब लड़ोगे ।

आज आरक्षण की सब ने लहर चलाई है,
संसद में भी इस मुद्दे पर बहस बढ़ाई है,
राजनेताओं ने गठबंधन करके,
चुनाव की बिगुल बजाई है,
शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए,
गठबंधन कब करोगे,
शिक्षा है सब के लिए ज़रुरी,
यह हुंकार कब भरोगे,
पूरा राष्ट्र शिक्षित हो इसके लिए,
बहस कब करोगे,
शिक्षा पाने के अधिकार के लिए,
कब लड़ोगे ।

महंगाई को मुद्दा बना कर,
संसद में तो रोज़ लड़ोगे,
पैट्रोल,डीज़ल की महंगाई को बनाकर मुद्दा,
देशव्यापि हड़ताल रोज़ करोगे,
महँगी शिक्षा को सस्ता करने के लिए,
कब अड़ोगे,
शिक्षा का मेक इन इंडिया कब करोगे,
शिक्षा पाने के अधिकार के लिए,
कब लड़ोगे ।

(संजय कुमार फरवाहा)

बेटी को बचाओ, बेटी को पढ़ाओ

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अपने घर के आँगन में, बेटी का वृक्ष लगाओ

तुलसी की तरह पूजो, फूलों की तरह सजाओ

आने दो इस दुनिया में, कोख में ना बलि चढ़ाओ

नन्हें हाथों को पकड़ के, शिक्षा का पथ दिखलाओ

बेटी को  बचाओ, बेटी को पढ़ाओ ।

लड़कियां ना होंगी तो, बेटी तुम किसे बुलाओगे

रक्षा बंधन के दिन, राखी किस से बँधवाओगे

नवरात्रे जब आएंगे , कंजक तुम किसे बनाओगे

भाई दूज के दिन माथे पर,  तिलक किस से सजवाओगे

कन्यादान का सुख पाना है तो , बेटी के जनक बन जाओ

इस गंगा को बहने दो, इस में ही तीर्थ पाओ

बेटी को बचाओ, बेटी को  पढ़ाओ ।

 

बेटिओं की प्रतिभा पर, जो तुम विश्वास जताओगे

हाथ पकड़ कर बेटिओं को,जो शिक्षा का राह दिखाओगे

बेटिओं के सपनो को, जो मंज़िल तक तुम पहुंचवाओगे

कहीं डॉक्टर, कहीं  इंजीनियर, कहीं राष्ट्रपति भी पाओगे

आज बेटिओं ने विश्व में, ऐसा कमाल कर दिखलाया है

हर क्षेत्र में पाकर सफलता, पूरे विश्व में नाम कमाया है

आज बेटियां नहीं हैं अबला, यह मन से भ्रम मिटाओ

हिम्मत बढ़ाओ बेटिओं की इन को भी आगे तुम बढ़ाओ

बेटी को बचाओ, बेटी को पढ़ाओ ।

गर्भ के अंदर बेटिओं के, प्राणो को जो मिटाओगे

पाप के भागी बनोगे तुम, कभी चैन से ना रह पाओगे

महा पाप है भ्रूण हत्या, नरकों में भी जगह ना पाओगे

फिर चाहे कितने भी तीर्थ करो, इस पाप से ना मुक्ति पाओगे

हाथ जोड़ कर विनती है, अपनी सोच को बड़ा बनाओ

बेटों के संग बेटिओं को भी, परिवार का हिस्सा बनाओ

पूरे देश में यही  जाग्रति लाओ, यही सन्देश  फैलाओ

बेटी को बचाओ, बेटी को पढ़ाओ ।

संजय कुमार फरवाहा

https://www.amarujala.com/kavya/mere-alfaz/sanjay-kumar-mera-rang-de-basanti-chola

मेरा रंग दे बसंती चोला

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मेरा रंग दे बसंती चोला 

 

आज सुनाता हूँ मैं कविता ऐसे वीर बलिदानी की

आज़ादी की खातिर ,जिसने बलि दी भरी जवानी की

घर- घर में आज़ादी की जिसने थी ,लो जलाई

अंग्रेज़ो को यह कह कर , जिसने ललकार लगाई

के,

मेरा रंग दे बसंती चोला,

माए ,रंग दे बसंती चोला

मेरा रंग दे बसंती चोला

माए, रंग दे बसंती चोला

 

बचपन से माता ने जिस को , पांच नदिओं का नीर पिलाया

देश प्रेम की घुटी देकर, देश का पूत बनाया

पिता ने  जिसको बचपन से साहस का पाठ पढ़या

चाचा के संग मिलकर जिसने बार-बार यही गाया

के,

मेरा रंग दे बसंती चोला

माए ,रंग दे बसंती चोला

मेरा रंग दे बसंती चोला

माए, रंग दे बसंती चोला

 

भारत माता ने ऐसा उस पर था प्रेम लुटाया

अंग्रेज़ो की राह में उसको जटिल सवाल बनाया

शिखा से उसको ज्योति , फिर ज्योति से मशाल बनाया

क्रांति की धुन जगा के उसको क्रांतिवीर बनाया

फिर, डरा सकी न कोई  उसको, गोली या तोप का गोला

गली-गली में गाता था जो , संग ले मस्तों का टोला

के,

मेरा रंग दे बसंती चोला,

माए ,रंग दे बसंती चोला

मेरा रंग दे बसंती चोला

माए, रंग दे बसंती चोला

 

आज़ादी की लड़ाई में जो बना था परिवर्तनकारी

दिल का जो था राष्ट्रवादी , कर्मों से क्रन्तिकारी

वतन हमारा अंग्रेज़ों की किसी थानेदारी

जुल्मों को अब नहीं सहेंगे , सुन ले अत्याचारी

सिंह ने जब ये  दहाड़ लगाई

पूरा देश था डोला

 गली-गली में बच्चा -बच्चा एक ही स्वर में बोला

के,

मेरा रंग दे बसंती चोला

माए ,रंग दे बसंती चोला

मेरा रंग दे बसंती चोला

माए, रंग दे बसंती चोला

 

क्रांति की वेदी पर जिसने अपना यौवन , धूपबत्ती की तरहाँ जलाया

वन्दे मातरम कहते -कहते मौत को गले लगाया

तभी तो वह शहीदे आज़म भगत सिंह कहलाया

शहीदों के बलिदानों के सदके ही

 आज  तिरंगा,शान से है  लहराया

याद करो क़ुरबानी उनकी , झुक कर  शीश नवाओ 

भगत सिंह को याद करके

सब मिल कर फिर से गाओ

के,

मेरा रंग दे बसंती चोला,

माए ,रंग दे बसंती चोला

मेरा रंग दे बसंती चोला

माए, रंग दे बसंती चोला

 

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(संजय कुमार फरवाहा )

HAPPY NEW YEAR 2017

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