हमारे बस्तों का बोझ कम हो इस बार


हम बच्चों की यही पुकार
हमारे बस्तों का बोझ कम हो इस बार

हम से मोटी हमारी पुस्तक
कैसे पढेगा हमारा छोटा सा मस्तिक्ष
मन की हमारे मन में ही रह जाती
स्कूल का काम करते -करते खेलने की बारी नहीं आती
इतना ना इस छोटे से तन और मन पर बोझ ल्द्वाओ
हम बच्चों पर कुछ तरस तो खाओ
कब तक बने रहेंगे लाचार
कब तक उठाएँगे यह बोझ हम निर्बल लाचार
निर्बल तन और मन की यही पुकार
हमारे बस्तों का बोझ कम हो इस बार

ऐसा पाठ्यक्रम नया बने
जिस से ना विद्यार्थी कभी डरें
सम्पुर्ण हो तन और मन का विकास
यही होगा हम बच्चों का सही उपहार
नया ज्ञान का दीप जलाओ
हम बच्चों पर कुछ तरस तो खाओ
हम बच्चों की यही पुकार
हमारे बस्तों का बोझ कम हो इस बार

{ संजय कुमार फर्वाहा }

स्वाह

नशा जिस किसी के भी जीवन मैं आ बसा
उस का जीवन कर दिया स्वाह
मेरा यह प्रयास है उस का साक्षात् गवाह
मेरे दोस्त खुद पे ना यह जुल्म ढाह
वरना तू भी हो जायेगा स्वाह
आज ही कर ले नशे से तोबा
मत बन इतना बेपरवाह
क्यूंकि
नशा जिस किसी के भी जीवन मैं आ बसा
उस का जीवन कर दिया

(संजय कुमार फर्वाहा )

अनमोल पूत

आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत को
जिसने पूरे विश्व में नाम कमाया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
उसे जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

परेशानी , दुःख और गरीबी में जो जन्मा था
वही भारत माता का स्वाभिमान ले के आया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत को
जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

जिसने जीवन भर शिक्षित बनो , संगठित रहो ,
संघर्ष करो का सन्देश फैलाया था
जिसने दलित भाई, पुस्तकों और
भारत देश पर असीम प्रेम लुटाया था
जो भारत की खोई आन -बान ले के आया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत को
जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

कर्तव्य परायणता , ईमानदारी , मेहनत, लगन और अथाह ज्ञान का सागर
जिसने पूरे विश्व में अपने ज्ञान का लोहा मनवाया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत को
जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

दलितों और अस्पर्शयों के
राजनीतिक, सामाजिक , धार्मिक अधिकारों के लिए
संघर्ष करते-करते जिसने अपना सारा जीवन बिताया था
जो लोकतन्त्र वाला यश-गान ले के आया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत को
जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

सारी मानव जाती के अस्तित्व के संघर्ष के लिए समर्पित
राजनेता , उत्कृष्ट समाज सेवी, चिन्तक, तेजस्वी वक्ता
कानून विशेषज्ञ, विख्यात अर्थशास्त्री और इन सब से
बढ़कर एक प्रखर राष्ट्रभक्त
भारत रत्न ,
जो बाबा साहिब कहलाया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत
बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को
जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

{संजय कुमार फरवाहा }

ऐ बरगद के पेड़ मुझ से बातें कर मुझे छेड़

ऐ बरगद के पेड़
मुझ से बातें कर मुझे छेड़
लोटा दे मेरा बीता बच्पन
खेल खीलोने , संगी साथी
और छुक – छुक करती रेल
ऐ बरगद के पेड़
मुझ से बातें कर मुझे छेड़

तेरे डाल पकड़ कर झूलते जाना
एक , दो , तीन की गीनती गिनना
फिर नीचे कूद लगाना
तेरे चारों तरफ घूमना
जोर-जोर से चिल्लाना
चंदु, रामू , राधा ,मोहन से
एक बार फीर से करा दे मेल
ऐ बरगद के पेड़
मुझ से बातें कर मुझे छेड़
लोटा दे मेरा बीता बच्पन
खेल खीलोने , संगी साथी
और छुक – छुक करती रेल

छुट्टी का दीन तेरी छाव में बीताना
तेरी शाखाओं पर झुला बनाना
झूलते जाना , हाथ ना आना
काठ की छोटी सी गाड़ी बनाना
मिट्ठु और राधा को उस में बिठाना
खींचते जाना शोर मचाना
कितना प्यारा था वोह खेल
ऐ बरगद के पेड़
मुझ से बातें कर मुझे छेड़
लोटा दे मेरा बीता बच्पन
खेल खीलोने , संगी साथी
और छुक – छुक करती रेल

बारिश के दीन तेरे डाल हीलाना
गीरती बूंदों को मुहँ पर गीराना
भीगते जाना , बाज़ ना आना
जब तक खत्म न हो जाये खेल
ऐ बरगद के पेड़
मुझ से बातें कर मुझे छेड़
लोटा दे मेरा बीता बच्पन
खेल खीलोने , संगी साथी
और छुक – छुक करती रेल

तेरी शाखाओं पर कूदते जाना
उन पर से गीरना चोट छुपाना
खेल खत्म होने से पहले घर वापीस ना जाना
बीना कहे कीसी को दर्द सहते जाना
माँ को पता लगा तो मार पड़ेगी
दोबारा खेलने ना देगी पेड़ -पेड़
ऐ बरगद के पेड़
मुझ से बातें कर मुझे छेड़
लोटा दे मेरा बीता बच्पन
खेल खीलोने , संगी साथी
और छुक – छुक करती रेल


छुपन -छुपाई खेलते जाना
दो,पाँच,दस जल्दी गीनकर
तेरी तने के पीछे छुप बैठ जाना
पकडे गए तो हार ना मानना
लंगड़ी टांग , पोषम पा
खेलते जाना , शोर मचाना
नाचते जाना
कितना पायरा था वोह खेल
ऐ बरगद के पेड़
मुझ से बातें कर मुझे छेड़
लोटा दे मेरा बीता बच्पन
खेल खीलोने , संगी साथी
और छुक – छुक करती रेल

{ संजय कुमर फरवाहा }

पापा मेरे मधुबन से बचपन को अपनी मधुशाला मत बनाओ



पापा मेरे मधुबन से बचपन को अपनी मधुशाला मत बनाओ


बहुत भूख लगी है
पापा रोटी ले आओ
शराब की बोतल पर
पैसा मत गवाओ
पापा मेरे मधुबन से बचपन को
अपनी मधुशाला मत बनाओ
बहुत भूख लगी है
पापा रोटी ले आओ


सिर्फ शराब पीकर
जिंदगी नहीं चलने वाली
सुबह से में बैठा हूँ
रख सामने खाली थाली
छोड नशे की लत
बेटे पर ध्यान लगाओ
पापा मेरे मधुबन से बचपन को
अपनी मधुशाला मत बनाओ
बहुत भूख लगी है
पापा रोटी ले आओ
शराब की बोतल पर
पैसा मत गवाओ
बहुत भूख लगी है
पापा रोटी ले आओ


आप ने तो सारी रात
शराब के ठेके पर बीता डाली
आपकी शराब की बोतल
और मेरी खाने की थाली
आज सुबह फिर से है खाली
उठो जरा फिर से काम पे ध्यान लगाओ
पापा मेरे मधुबन से बचपन को
अपनी मधुशाला मत बनाओ
बहुत भूख लगी है
पापा रोटी ले आओ
शराब की बोतल पर
पैसा मत गवाओ
बहुत भूख लगी है
पापा रोटी ले आओ


गरीबी और नशा दोनों संग न भायें
संग नशा अपने बदहाली भी ले आयें
बदहाली को जानबूझ कर मत बुलाओ
छोड नशे की बुरी लत
अपना और मेरा जीवन बचाओ
पापा मेरे मधुबन से बचपन को
अपनी मधुशाला मत बनाओ
बहुत भूख लगी है
पापा रोटी ले आओ
शराब की बोतल पर
पैसा मत गवाओ
बहुत भूख लगी है
पापा रोटी ले आओ

{ संजय कुमार फर्वाहा }

ऐ पेड़ मैं तेरी शाख से टुटा हुआ पत्ता


एक दीन अचानक मेरी नज़र एक पेड़ पर पड़ी मैंने देखा की तेज हवा ने पत्ते को पेड़ से अलग कर दीया मुझे लगा की पत्ता पेड़ से कुछ कह रहा था क्या कह रहा था वोह इस कविता में है


ऐ पेड़
मैं तेरी शाख से टुटा हुआ पत्ता
बेदर्द हवा ने तोड़ दीया
मैं रह गया हक्का – बक्का
बाहें फैलाएँ तुझ को पुकारूँ
या मुझे अपने तन से लगा ले
या मुझे अपनी जड्ड में जगा दे
जल जाऊंगा मैं
गल जाऊंगा मैं
जल – जल के भी
गल -गल के भी
करदूं आबाद तेरे हिस्से
ऐ पेड़
मैं तेरी शाख से टुटा हुआ पत्ता

पत्ते की यह दुःख भरी बातें सुन कर पेड़ भी बैचैन हो उठा और विलाप करने लगा

ऐ पत्ते
मेरे बच्चे
मैं तुझ बिन रह न पाऊं
तुझ से बिछड़ने की पीड़ा
मैं जा कर किसे सुनाउँ
ऐ पत्ते
मेरे बच्चे
मैं तुझ बिन रह न पाऊं
मुझ से बिछड़कर
मेरी जड्ड से लिपट कर
जल-जल कर भी
गल-गल कर भी
तुने खुद को खाक बनाया
मेरी जड्डों को देकर खाद
तुने मेरे तन को आबाद बनाया
यह ही तो सच्ची प्रीत है तेरी
मर कर भी तुन्ने सुध ली मेरी
बालक से अब
बन बैठा तू
मेरा पालन हारा

मैं पेड़ सब पत्ते मेरे हैं बालक
तू मेरे था तन का हिस्सा
अब मेरा है पालक
मैं पेड़ सब पत्ते मेरे हैं बालक

{ संजय कुमार फरवाहा }

मैं पेड़ सब पत्ते मेरे हैं बालक

मैं पेड़
सब पत्ते मेरे हैं बालक
यह मेरे हैं तन का हिस्सा
मैं इन का हूँ पालक
मैं पेड़
सब पत्ते मेरे हैं बालक
यह मेरे हैं तन का हिस्सा
मैं इन का हूँ पालक

मेरे डाल-डाल पर
फुदक-फुदक कर
पंछी करें कलोलें
मीठी – मीठी
स्वर वाणी में
कोयल पपीहा बोले
यह सब मेरे सच्चे साथी
मैं इन का हूँ पालक
मैं पेड़
सब पत्ते मेरे हैं बालक
यह मेरे हैं तन का हिस्सा
मैं इन का हूँ पालक

मेरे पात -पात पर
संग सखिओं के
चीटियाँ विचरती जायें
असंख्य कीडे
जड़ मेरी में अपना घर बसायें
यह सब मेरे संगी साथी
मैं इन का हूँ पालक
मैं पेड़
सब पत्ते मेरे हैं बालक
यह मेरे हैं तन का हिस्सा
मैं इन का हूँ पालक

देखो तो कैसे ,
मेरी शाखाओं पर
बन्दर उछल रहें हैं
मेरी प्रीत की डोर में
बंध कर कैसे
पंछी मचल रहें हैं
मदहोश हवाएँ गाती आयें
बांध गले में ढोलक
मैं पेड़
सब पत्ते मेरे हैं बालक
यह मेरे हैं तन का हिस्सा
मैं इन का हूँ पालक

{ संजय कुमार फरवाहा}

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