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आज भी मुझे अपनी पाठ्शाला की घंटी बहुत याद आती है ।

आज भी मुझे अपनी पाठ्शाला की घंटी बहुत याद आती है ै ।

विद्यार्थी जीवन सीखने के लिए सबसे उपयुक्त समय होता है । पाठशाला जाना, पढना , खेलना , दोस्तो का साथ , स्कूल की हर चीज से विद्यार्थी जुड़ा होता है । फिर चाहे वो स्कूल की पाठ्शाला की ईमारत हो , बैठने के बैंच हो, अध्यापक , खेल का मैदान आदी । पर एक और वस्तु है जीस पर न सिर्फ विद्यार्थीओं का बल्की अध्यापकों का ध्यान भी एका – एक जाता रहता है । वह है पाठ्शाला की घंटी । पाठशाला की घंटी से विद्यार्थी की भावनाएं भी जुडी होती हैं । पाठशाला के शुरू होने की पहली घंटी । विद्यार्थीओ का भाग कर अपनी – अपनी कक्षाओं में जाना । फीर प्रार्थना के लीए आना मनं में भक्ती भाव जगाता है । आंखे बंद करके हाथ जोड़ना फीर भग्वान से विद्या का दान मांगना । फीर एक की बाद एक घंटी का बजना और कक्षाओं का बदलना । ज़ब कोई अध्यापक दण्डित करता तो घंटी जल्दी बजने का इंतजार । खेल की कक्षा में घंटी जल्दी ना बजने की भग्वान से प्रार्थना। भूख लगने पर आधी छुट्टी की घंटी बजने का इंतज़ार। और सब से जयादा पूरी छुट्टी की घंटी का इंतजार होता है । घंटी बजते ही जोर-जोर से शोर मचाना और मुस्कुराते हुऐ घर की तरफ भागना । आज भी मुझे अपनी पाठ्शाला की घंटी बहुत याद आती है और पाठ्शाला का अनुशासन रखने में कितनी महतवपूर्ण भूमिका निभाती है ।

{ संजय कुमार फरवाहा }

क्या सिर्फ गाड़ी का हार्न बजाने मात्र से हमारी जिमेवारी पूरी हो जाती है ।

क्या सिर्फ गाड़ी का हार्न बजाने मात्र से हमारी जिमेवारी पूरी हो जाती है ।
जी हाँ , में यह ही कहना चाहता हूँ । मैं अक्सर सडको पर , शहरों की गलीओं में,
या फ़ीर भीड़ भाड़ वाली जगहों पर लोगों को आपस में लडते हूए जख्मी हालत में
देखता हूँ । अग़र हम दुर्घटना में जख्मी हूए लोगों के पास जाएँ और पूछें की
भाई यह दुर्घटना केसे हुई तो वोह यह ही कहते हैं की मेरा कोई कसूर नहीं है
मैने तो गाड़ी का हार्न बजाय था । यही नहीं अक्सर देखने में आता है की हम
चोराहोंं पर दायें , बायें बिलकुल भी नहीं देखते हैं बस हार्न बजाते हैं और
तेज गती से अपना वहान चलते हुए नीकल जाते है दुर्घटना की स्थिति में यह कह कर
दूसरों पर दोष मढ़ देते हैं की मैंने तो हार्न बजाय था, यह ही सथिती कीसी
दुसरे वाहन को क्रास करते हुए भी पाई जाती है हम लोग हार्न बजाते हैं और
तेजी से सड़क पर साथ चल रहे वाहन को क्रास करने की कोशीश करतें हैं और
दुर्घटना का कर्ण बनते हैं अंत में फ़ीर वोही बात मैंने तो हार्न बजाय था
गलती तो दूसरी की है ।*
*सीर्फ हार्न बजा कर ही हमारी जिम्मेदारी पूरी नही हो जाती है , हार्न का
मतलब यह नहीं है की आप सड़क पर यातायात के नीयम का उलंघन करें ।*
*हार्न हमारी और सड़क पर चल रहे दुसरे लोगों की सुरक्षा के लीए है ना की नीयम का
उलंघन कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लीए । *

*( संजय कुमार फरवाहा) *

सफाई वाला

सफाई वाला

 


-संजय कुमार फरवाहा

मेरी नजर से देखिए। जरा सोचिए, हम जरा सा भी बीमार हो जाते हैं तो सीधे डॉक्टर के पास दोड़े दोड़े चले जाते हैं। डॉक्टर से इलाज करवाते हैं। ठीक होकर घर वापिस चले आते हैं, जब भी बीमारी के बारे में सोचते हैं तो कहते हैं मुझे तो डॉक्टर ने बचा लिया, वो तो भग्वान का रूप है। पर मैं सोचता हूँ की एक इंसान और है जो जो डॉक्टर से पहले हमें बिमारिओं से बचाता है। हम में से किसी ने उस के बारे में शायद सोचा भी नहीं होगा कभी भी उसे भगवान का का दर्जा नहीं दिया होगा। क्या आप जानते हैं वोह कौन है ? वोह है एक आम सा दीखने वाला सफाई करने वाला। सफाई वाला ही एक ऐसा इंसान है जो हमें डॉक्टर से पहले सफाई कर हजारों बीमारीओं से बचाता है। खुद को फैले गंद, गंदे पानी और बदबू का सामना करके अपनी सासों को भारी करके आप को साफ सांसे दिल्वाता है। फिर भी आपकी प्रशंसा के दो बोल सुन्ने को तरस जाता है। आप की ही उपेक्षा का शिकार बन कर रह जाता है, जरा मेरे नज़रिए से सोचिए वो आप के स्वास्थ्य को ठीक रखने में कितना मददगार साबित होता है ।

November 6th, 2010 | Tags: