ऐ पेड़ मैं तेरी शाख से टुटा हुआ पत्ता


एक दीन अचानक मेरी नज़र एक पेड़ पर पड़ी मैंने देखा की तेज हवा ने पत्ते को पेड़ से अलग कर दीया मुझे लगा की पत्ता पेड़ से कुछ कह रहा था क्या कह रहा था वोह इस कविता में है


ऐ पेड़
मैं तेरी शाख से टुटा हुआ पत्ता
बेदर्द हवा ने तोड़ दीया
मैं रह गया हक्का – बक्का
बाहें फैलाएँ तुझ को पुकारूँ
या मुझे अपने तन से लगा ले
या मुझे अपनी जड्ड में जगा दे
जल जाऊंगा मैं
गल जाऊंगा मैं
जल – जल के भी
गल -गल के भी
करदूं आबाद तेरे हिस्से
ऐ पेड़
मैं तेरी शाख से टुटा हुआ पत्ता

पत्ते की यह दुःख भरी बातें सुन कर पेड़ भी बैचैन हो उठा और विलाप करने लगा

ऐ पत्ते
मेरे बच्चे
मैं तुझ बिन रह न पाऊं
तुझ से बिछड़ने की पीड़ा
मैं जा कर किसे सुनाउँ
ऐ पत्ते
मेरे बच्चे
मैं तुझ बिन रह न पाऊं
मुझ से बिछड़कर
मेरी जड्ड से लिपट कर
जल-जल कर भी
गल-गल कर भी
तुने खुद को खाक बनाया
मेरी जड्डों को देकर खाद
तुने मेरे तन को आबाद बनाया
यह ही तो सच्ची प्रीत है तेरी
मर कर भी तुन्ने सुध ली मेरी
बालक से अब
बन बैठा तू
मेरा पालन हारा

मैं पेड़ सब पत्ते मेरे हैं बालक
तू मेरे था तन का हिस्सा
अब मेरा है पालक
मैं पेड़ सब पत्ते मेरे हैं बालक

{ संजय कुमार फरवाहा }

Advertisements

मैं पेड़ सब पत्ते मेरे हैं बालक

मैं पेड़
सब पत्ते मेरे हैं बालक
यह मेरे हैं तन का हिस्सा
मैं इन का हूँ पालक
मैं पेड़
सब पत्ते मेरे हैं बालक
यह मेरे हैं तन का हिस्सा
मैं इन का हूँ पालक

मेरे डाल-डाल पर
फुदक-फुदक कर
पंछी करें कलोलें
मीठी – मीठी
स्वर वाणी में
कोयल पपीहा बोले
यह सब मेरे सच्चे साथी
मैं इन का हूँ पालक
मैं पेड़
सब पत्ते मेरे हैं बालक
यह मेरे हैं तन का हिस्सा
मैं इन का हूँ पालक

मेरे पात -पात पर
संग सखिओं के
चीटियाँ विचरती जायें
असंख्य कीडे
जड़ मेरी में अपना घर बसायें
यह सब मेरे संगी साथी
मैं इन का हूँ पालक
मैं पेड़
सब पत्ते मेरे हैं बालक
यह मेरे हैं तन का हिस्सा
मैं इन का हूँ पालक

देखो तो कैसे ,
मेरी शाखाओं पर
बन्दर उछल रहें हैं
मेरी प्रीत की डोर में
बंध कर कैसे
पंछी मचल रहें हैं
मदहोश हवाएँ गाती आयें
बांध गले में ढोलक
मैं पेड़
सब पत्ते मेरे हैं बालक
यह मेरे हैं तन का हिस्सा
मैं इन का हूँ पालक

{ संजय कुमार फरवाहा}

मेरा भाई मेरी जीन्दगी में एक खुशबु की तरहां है

मेरा भाई मेरी जीन्दगी में एक खुशबु की तरहां है


मेरा भाई मेरी जीन्दगी में
एक खुशबु की तरहां है
ईस नायाब खुशबु को मैं
कैसे -कैसे महसूस करूँ
बस कहाँ से पकडूँ
हवा के कौन से झोंके को मुट्ठी में बंद कर लूँ
ईस कशमकश में हूँ
मेरा भाई मेरी जीन्दगी में
एक खुशबु की तरहां है

कई खुबसूरत लम्हे अपने भाई की यादों के
कई खुबसूरत शामें अपने भाई की यादों की
कई पड़ाव
छोटे – बडे , ठहरे हुए
खुशबु के झोंके बन कर
मुझे छेड़ – छेड़ कर जा रहें हैं
इन खुशबु के झोंकों को
मैं भी छेड़ना चाहता हूँ
पर कैसे
इस कशमकश में हूँ
मेरा भाई मेरी जीन्दगी में
एक खुशबु की तरहां है
ईस नायाब खुशबु को मैं
कैसे कैसे महसूस करूँ
बस कहाँ से पकडूँ
हवा के कौन से झोंके को मुट्ठी में बंद कर लूँ
ईस कशमकश में हूँ

जब – जब मैं अपने भाई से
कई दीनो के बाद मिलता हूँ
तो उसकी महकती हुई बातों में खो जाता हूँ
मैं उस लम्हे को महसूस करता हूँ
मैं वोह लम्हें घूंट घूंट पिता रहता हूँ
ऐसे लम्हें ना जाने फीर कब आयेंगे
इस कशमकश में हूँ
मेरा भाई मेरी जीन्दगी में
एक खुशबु की तरहां है
इस नायाब खुशबु को मैं
कैसे कैसे महसूस करूँ
बस कहाँ से पकडूँ
हवा के कौन से झोंके को मुट्ठी मैं बंद कर लूँ
ईस कशमकश में हूँ

गर्मिओं की तपती दोपहर में
एक ठंडी हवा का झोंका
जब झुलसते शारीर को छु कर जाता है
रूह को महकाता है
ढूढ़ता हूँ कहाँ गया वोह
ऐसा है मेरा भाई
जीसे हर पल मैं अपने
आस-पास महसूस करता हूँ
पर मैं उससे
कैसे मिलूं
इस कशमकश में हूँ
मेरा भाई मेरी जीन्दगी में
एक खुशबु की तरहां है
ईस नायाब खुशबु को मैं
कैसे कैसे महसूस करूँ
बस कहाँ से पकडूँ
हवा के कौन से झोंके को मुट्ठी मैं बंद कर लूँ
ईस कशमकश मैं हूँ

ईस मतलब की दुनिया में
लोग ढूंढते हैं अपनों को
मोती, रूबी , हीरे जवाहरात की चमक में
पर इन सब से अलग
प्रीत की नायब खुशबु है
मेरा भाई
ईस नायाब खुशबु को मैं
कैसे कैसे महसूस करूँ
बस कहाँ से पकडूँ
हवा के कोन से झोंके को मुट्ठी मैं बंद कर लूँ
ईस कशमकश मैं हूँ

मेरा भाई मेरी जीन्दगी में
एक खुशबु की तरहां है
ईस नायाब खुशबु को मैं
कैसे कैसे महसूस करूँ
बस कहाँ से पकडूँ
हवा के कौन से झोंके को मुट्ठी मैं बंद कर लूँ
ईस कशमकश मैं हूँ

{ संजय कुमार फरवाहा}

देखो भाई एक अनोखी रेल आई

मेरा जन्म नंगल में हुआ । इस लीये मुझे जहाँ की हर एक चीज अच्छी लगती है । मैं बचपन से ही नंगल से भाखड़ा जाने वाली रेलगाड़ी को देखता आया हूँ । इस रेलगाड़ी के प्रति अपने मनं की भावनाओं को मैं ईस कविता के माध्यम से आप तक पहुंचा रहा हूँ ।


देखो भाई एक अनोखी रेल आई
जिसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक
मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई

ना किसी ने टी. टी. को टिकेट दीखाई , ना ही गार्ड ने सिटी बजाई
ना ही कीसी ने स्टेशन पर गाड़ी के आने जाने की घोषणा करवाई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई
जीसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक
मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई

नंगल और भाखडा के साथ लगते जीतने भी हैं गाँव
उन सब में रहने वाले लोगों के आती प्रतिदिन यह काम
कोई बाजार जाने को चढ़ जाए
तो किसी को सुंदर दृशय लुभाएँ
देखो तो बूढी मेरी अम्मा
लीये हाथ में थेला और डंडा
जरा भी ईस में ना घबराई
ख़त्म कर सब काम यह अपने
वापिस ओलिंडा लोट आई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई
जिसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक
मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई

पहले सुबह सात बजे फीर दोपहर तीन बजे यह चलने का हार्न बजाये
फीर नंगल से भाखडा तक बी.बी.एम .बी. के करमचारियो को काम पर ले जाये
नंगल से धीरे धीरी यह चलकर लेबर हट तक जाये,
फीर दुबेटा ,गवाल्थई से गुजरकर सब को ओलिंडा पहुँचाए
तैयार हो जाओ भाखड़ा वालों
अब अंतिम स्टेशन भाखड़ा पर
उतारने की तुम्हारी बारी आई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई
जिसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक
मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई

कई तरहां के डिब्बे इसमें प्रबंधकों ने है लगवाए
किसी को कीर्तन भजन मंडली का
तो किसी को साधारण डीब्बा ही भाए
प्रबंधकों ने तो महिलाओं को इस में
अलग डिब्बे की सुविधा हें दीलवाई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई
जीसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक
मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई

बलखाती मस्ती में यह तो पटरी पर दौड़ी जाये
ड्राईवर भी हर क्रासिन्ग पर जोर जोर से हार्न बजाये
सतलुज के किनारे चलते चलते यह
मुसाफिरों को नंगल के मनमोहक दृशय दिखलाए
नंगल से भाखड़ा के रास्ते में एक सुरंग भी है भाई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई
जीसने नंगल में अपनी एक अलग पहचान हें बनाई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई
जिसने नंगल टाउनशिप से भाखड़ा तक
मुसाफिरों को मुफ्त की सैर करवाई
देखो भाई एक अनोखी रेल आई

( संजय कुमार फर्वाहा )

इस बार बाल दिवस पर कुछ नया कर के दीखाओ

बाल दिवस एक कवीता

इस बार बाल दिवस पर कुछ नया कर के दीखाओ
फीर बाल दिवस मनाओ

इस बार पहले होटलों, रेस्तराओं, चाय दुकानों, पर जाओ
बालकों को बाल श्रम से बचाओ ,
उनकी दय्निया हालत पर दृष्टी दोडाओ
फीर बाल दिवस मनाओ
इस बार बाल दिवस पर कुछ नया कर के दीखाओ
फीर बाल दीवस मनाओ

इस बार पहले बालको को घरेलू नौकर के रूप में
अपमान और उत्‍पीड़न सहने से बचाओ
फीर बाल दीवस मनाओ
इस बार बाल दीवस पर कुछ नया कर के दीखाओ
फीर बाल दीवस मनाओ

इस बार पहले ईंट भट्ठों, और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में काम कर रहे
बालकों पर नज़र घुमाओ, उनका शोषण रुकवाओ
फीर बाल दीवस मनाओ
इस बार बाल दिवस पर कुछ नया कर के दिखाओ
फिर बाल दिवस मनाओ

बालकों पर बना लीया ‘बाल श्रम अपराध कानून’ आपने
बालकों पर जत्ता लीया भाषणों से बड़ा प्यार आपने
इस बार बालकों को घनघोर गरीबी में जीने के अभिशाप से बचाओ
फीर बाल दीवस मनाओ
इस बार बाल दीवस पर कुछ नया कर के दीखाओ
फिर बाल दिवस मनाओ

इस बार पहले बालकों के हाथ में
पढने लिखने के लिए कापी,पेंसिल और स्कूल का बस्ता थमाओ
बालकों को गली गली कूड़ा कचरा चुनने से बचाओ
फीर बाल दीवस मनाओ
इस बार बाल दीवस पर कुछ नया कर के दीखाओ
फीर बाल दीवस मनाओ

आपने अपने लम्बे भाषणों में
बच्चों को देश का भविषय बताया
पर बच्चों ने संसाधनों के आभाव में
अपनी इच्छाओं का है गला दबाया
इस बार पहले बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी मन से नीभाओ
फीर बाल दीवस मनाओ
इस बार बाल दीवस पर कुछ नया कर के दीखाओ
फीर बाल दीवस मनाओ

{ संजय कुमार फर्वाहा }

सतलुज नदी ( मेरी सतलुज माई )

सतलुज नदी ( मेरी सतलुज माई )

हिमालय की जाई
तिब्बत से वीदा होके आई
जीस के चरण सपर्श से ही वसुंधरा लहलहाई
वह ही तो है मेरी सतलुज माई

शीपकी में जांसकर पर्वत श्रृंखला को काटकर
किन्नौर, कुल्लू ,सोलन और मंडी को अपना नीर्मल जल बाँट कर
ऊँच – नीच और जात – पात का भेद मीटाकर
जो स्नेह से कलकल करती आई
वह ही तो है मेरी सतलुज माई
हिमालय की जाई
तिब्बत से वीदा होके आई
जीस के चरण सपर्श से ही वसुंधरा लहलहाई
वह ही तो है मेरी सतलुज माई

पथ में जीस के एक खड़ा है बांकुरा
नाम जीस का पड़ा है भाखड़ा
भाखड़ा ने जीसकी जलधारा को पाकर
जीस्की जलशक्ति से संयंत्र चलाकर
घर घर बीजली पहुँचाई
वह ही तो है मेरी सतलुज माई
हिमालय की जाई
तिब्बत से वीदा होके आई
जीस के चरण सपर्श से ही वसुंधरा लहलहाई
वह ही तो है मेरी सतलुज माई

जीस की जलधारा में हजारों जीव जंतुओं ने अपना जीवन पनपाया
जीसने अपने दोनों किनारों पर अपने दो बेटों को है बसाया
जीस का बड़ा बेटा नंगल तो छोटा नया नंगल कहलाया
जिसके बडे बेटे ने बीजली तो दुसरे ने खाद का कर उत्पादन
पूरे वीश्व में शोहरत पाई
वह ही तो है मेरी सतलुज माई
हिमालय की जाई
तिब्बत से वीदा होके आई
जीस के चरण सपर्श से ही वसुंधरा लहलहाई
वह ही तो है मेरी सतलुज माई

{संजय कुमार फर्वाहा }

छोटा सा गोपाला

माँ यशोदा अपने बेटे कृष्ण को प्यार करती है और गाती है

छोटा सा गोपाला

छोटा सा गोपाल रे
मेरा नन्द लाला रे
छोटा सा कन्हया रे
ले लूँ में बल्लियाँ रे

छोटे छोटे हाथ इसके
छोटे छोटे पावं इसके
मीठी मीठी बतियाँ रे
में सुनु दीन रतिया रे
छोटा सा गोपाल रे
मेरा नन्द लाला रे
छोटा सा कन्हया रे
ले लूँ में बल्लियाँ रे

कभी ये हसता है
कभी ये रुलाता है
पीछे पीछे दोडू में
यह पकड़ में न आता है
देखो केसा छलिया रे
बजाये यह मुरलिया रे

छोटा सा गोपाल रे
मेरा नन्द लाला रे
छोटा सा कन्हया रे
ले लूँ में बल्लियाँ रे

{ संजय कुमार फरवाहा }

Previous Older Entries Next Newer Entries