अनमोल पूत

आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत को
जिसने पूरे विश्व में नाम कमाया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
उसे जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

परेशानी , दुःख और गरीबी में जो जन्मा था
वही भारत माता का स्वाभिमान ले के आया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत को
जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

जिसने जीवन भर शिक्षित बनो , संगठित रहो ,
संघर्ष करो का सन्देश फैलाया था
जिसने दलित भाई, पुस्तकों और
भारत देश पर असीम प्रेम लुटाया था
जो भारत की खोई आन -बान ले के आया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत को
जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

कर्तव्य परायणता , ईमानदारी , मेहनत, लगन और अथाह ज्ञान का सागर
जिसने पूरे विश्व में अपने ज्ञान का लोहा मनवाया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत को
जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

दलितों और अस्पर्शयों के
राजनीतिक, सामाजिक , धार्मिक अधिकारों के लिए
संघर्ष करते-करते जिसने अपना सारा जीवन बिताया था
जो लोकतन्त्र वाला यश-गान ले के आया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत को
जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

सारी मानव जाती के अस्तित्व के संघर्ष के लिए समर्पित
राजनेता , उत्कृष्ट समाज सेवी, चिन्तक, तेजस्वी वक्ता
कानून विशेषज्ञ, विख्यात अर्थशास्त्री और इन सब से
बढ़कर एक प्रखर राष्ट्रभक्त
भारत रत्न ,
जो बाबा साहिब कहलाया था
आज मैं शत् शत् नमन करता हूँ
भारत माता के अलबेले अनमोल पूत
बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को
जो भारत के लिए संविधान ले के आया था

{संजय कुमार फरवाहा }

Advertisements

महँगी हुई दीवाली

आजकल हर चीज बहुत महंगी है , यह कविता एक पिता की भावनाओं को वयक्त करती है
जिन के पास पेसे कम हैं

 

महँगी हुई दीवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या करें
महँगी हुई दीवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या करें

चुन्नू को चाहिए महँगी फुलझरियां
मुन्नू को महँगे बम,पटाके
इन पर पैसे खर्च दिए तो
घर में पड़ जाएँगे फाके

अब पापा क्या करें
महँगी हुई दीवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या करें

पत्नी को चाहीय महँगी साड़ी
बीन साड़ी नहीं चलेगी ग्रहस्ती की गाड़ी

बीन साड़ी पत्नी ना माने
कहती है मत बनाओ महंगाई के बहाने
साड़ी नहीं मीली तो चली जायेगी माइके
अब पापा क्या कर
महँगी हुई दीवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या करें

आलू,पुड़ी, खीर , कचोडी
महगाई ने कमर है तोड़ी

मेवा फल मीठे पकवान
महंगाई ने भुला दिए हैं इन के नाम
कैसे लाऊँ मैं यह सब घर पर अपने
महंगाई खड़ी है घर दवार पे मेरे
जैसे लठ लीए कोई दरवान
अब पापा क्या करैं
महँगी हुई दिवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या कारें

की है सिर्फ घर की सफाई
महंगाई ने छीन ली है पुताई
सजा ना पाऊं घर को में अपने
धरे रह गए मनं के सब सपने
बस काम चला रहा हूँ
घर के दवार पे में अपने
बस बांध शुभ दीवाली का बन्दनवार
अब पापा क्या करे
महँगी हुई दीवाली
अब पापा क्या करें
पापा की जेब है खाली
अब पापा क्या करें

 

(संजय कुमार फरवाहा )